भूमिका
परिवर्तन संसार का नियम है। यहाँ आज का सुख कल के दुःख में बदल सकता है और आज का वैभव कल के अभाव में। लेकिन इस अस्थिरता के बीच एक ऐसा ‘अटूट सिद्धांत’ है जो मनुष्य का साथ कभी नहीं छोड़ता—वह है ज्ञान। ज्ञान वह आंतरिक प्रकाश है जो घोर अंधकार में भी मार्ग प्रशस्त करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता
श्रीकृष्ण ने गीता में ज्ञान की महिमा को सर्वोपरि माना है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ज्ञान के समान पवित्र करने वाला इस संसार में कुछ भी नहीं है:
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। (गीता 4.38)
अर्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निस्संदेह कुछ भी नहीं है।जब मनुष्य के पास सही ज्ञान (विवेक) होता है, तो वह मोह और भ्रम की स्थिति से बाहर निकल आता है। जिस प्रकार अग्नि ईंधन को जलाकर राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि मनुष्य के सभी संशयों और बंधनों को भस्म कर देती है।संतों की वाणी में ज्ञान का महत्त्वभारत की पावन धरती पर अनेक संतों ने अपने अनुभव से ज्ञान की महत्ता को सिद्ध किया है।
* कबीर दास जी के अनुसार: कबीर कहते हैं कि केवल पढ़ लेने से कोई ज्ञानी नहीं होता, बल्कि प्रेम और सत्य का अनुभव ही वास्तविक ज्ञान है:
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।”
यहाँ कबीर उस ‘अनुभवजन्य ज्ञान’ की बात कर रहे हैं जो मनुष्य को अहंकार से मुक्त करता है।
* स्वामी विवेकानंद के विचार: स्वामी जी का मानना था कि ज्ञान हमारे भीतर ही विद्यमान है, उसे बस जाग्रत करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा था:
“शिक्षा और ज्ञान का अर्थ केवल जानकारी जमा करना नहीं है, बल्कि एकाग्रता और चरित्र निर्माण है।ज्ञान: जो संकट में ढाल बनता हैजीवन में जब कठिन समय आता है, तो धन-दौलत साथ छोड़ सकते हैं, लेकिन अर्जित किया गया बोध (Wisdom) हमेशा साथ रहता है।
अविनाशी पूँजी: जैसा कि नीति शास्त्र में कहा गया है—”विद्या धनं सर्वधन प्रधानम्”।
यह ऐसा धन है जिसे न कोई चोर चुरा सकता है और न ही राजा छीन सकता है।
निर्णय लेने की शक्ति: संत तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है—*”बिनु सत्संग विवेक न होई” अर्थात बिना सही ज्ञान और संगति के विवेक पैदा नहीं होता, और विवेक ही हमें सही निर्णय लेने की शक्ति देता है।
निष्कर्ष
ज्ञान केवल एक मानसिक व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। यह वह अमूल्य निधि है जो बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक, और इस लोक से परलोक तक मनुष्य का साथ निभाती है। संतों और शास्त्रों का यही मत है कि जो व्यक्ति ज्ञान की खोज में लगा रहता है, वह कभी अकेला या असहाय नहीं होता।
“ज्ञान बाँटने से बढ़ता है और जीवन में उतारने से वह मोक्ष का द्वार खोलता है ”