ईमाँ मुझे रोके है तो, खींचे है मुझे कुफ्र,काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे !!

मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर उनके सबसे प्रसिद्ध और गहरे शेरों में से एक है। इसमें उन्होंने इंसान के मन के भीतर चलने वाले द्वंद्व (Conflict) को बहुत ही खूबसूरती से बयान किया है।
यहाँ शेर का आसान अर्थ और उसकी गहराई दी गई है:
शेर का सरल अर्थ
“मेरा ईमान (धर्म/आस्था) मुझे गलत रास्ते पर जाने से रोकता है, लेकिन मेरा कुफ्र (बेधर्मी/सांसारिक आकर्षण) मुझे अपनी ओर खींचता है। हालत यह है कि काबा (धर्म का प्रतीक) मेरे पीछे रह गया है और कलीसा (मंदिर या गिरजाघर, जो यहाँ दुनिया के आकर्षण का प्रतीक है) मेरे सामने है।”
शेर की गहराइयाँ (Analysis)

  • ईमान और कुफ्र की कशमकश: ग़ालिब यहाँ अपनी उस मानसिक स्थिति को दिखा रहे हैं जहाँ एक तरफ नेक रास्ता (धर्म) है और दूसरी तरफ दुनिया की लज़्ज़तें और गुनाह। इंसान अक्सर इन दो ध्रुवों के बीच झूलता रहता है।
  • काबा और कलीसा: * काबा यहाँ उस मंज़िल का प्रतीक है जिसे छोड़कर इंसान आगे बढ़ आया है या जिसे वह भूलता जा रहा है।
  • कलीसा का मतलब वैसे तो गिरजाघर होता है, लेकिन उर्दू शायरी में इसे अक्सर ‘हसीनों के ठिकाने’ या ‘सांसारिक मोह-माया’ के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।
  • बेचैनी का चित्रण: शायर न तो पूरी तरह खुदा का हो पा रहा है और न ही पूरी तरह दुनिया का। वह बीच में खड़ा है—पीछे मुड़कर देखता है तो धर्म याद आता है, सामने देखता है तो दुनिया का आकर्षण उसे अपनी तरफ खींचता है।
    ग़ालिब का अंदाज़
    यह शेर ग़ालिब की उस ‘Human Nature’ को समझने की कला को दिखाता है जिसमें हम जानते हैं कि सही क्या है, लेकिन फिर भी दिल गलत या मुश्किल रास्तों की तरफ खिंचा चला जाता है।

“ईमाँ मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र,
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।”

मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर केवल एक व्यक्तिगत कशमकश नहीं है, बल्कि इसे एक समाजशास्त्रीय (Sociological) नज़रिए से देखने पर 19वीं सदी के भारतीय समाज के गहरे अंतर्विरोध (Contradictions) नज़र आते हैं।
ग़ालिब उस दौर में जी रहे थे जब पुरानी मुगलिया तहजीब (Old Order) दम तोड़ रही थी और ब्रिटिश उपनिवेशवाद (New Modernity) अपने पैर पसार रहा था। इस शेर का समाजशास्त्रीय विश्लेषण निम्नलिखित बिंदुओं में किया जा सकता है:

  1. संक्रमणकालीन समाज (Transitional Society)
    ग़ालिब का “काबा” और “कलीसा” के बीच खड़ा होना, असल में उस समय के भारतीय समाज की स्थिति है।
  • काबा (परंपरा): यह पुरानी सामंती व्यवस्था, धार्मिक जड़ों और स्थापित नैतिक मूल्यों का प्रतीक है। समाज का एक हिस्सा इसे छोड़ना नहीं चाहता क्योंकि यही उसकी पहचान है।
  • कलीसा (आधुनिकता/बदलाव): कलीसा (चर्च) यहाँ पश्चिमी शिक्षा, नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और औपनिवेशिक आधुनिकता की ओर इशारा करता है। ग़ालिब के लिए यह केवल ‘ईसाईयत’ नहीं, बल्कि वह ‘नया’ है जो उन्हें अपनी ओर खींच रहा है, भले ही वह अनजाना और डरावना हो।
  1. पहचान का संकट (Identity Crisis)
    समाजशास्त्र में इसे ‘Anomie’ या मूल्यों का बिखराव कह सकते हैं। जब पुराने नियम लागू नहीं हो पाते और नए नियम अभी पूरी तरह समझ नहीं आए होते, तब व्यक्ति और समाज इसी तरह के ‘Liminal Space’ (दो छोरों के बीच की जगह) में होते हैं।
  • ईमान और कुफ्र: यह केवल धार्मिक शब्द नहीं हैं। समाजशास्त्रीय दृष्टि से, ‘ईमान’ वह सामाजिक अनुबंध (Social Contract) है जिसे समाज ने सदियों से माना है, और ‘कुफ्र’ वह विद्रोह है जो यथास्थिति (Status Quo) को चुनौती देता है।
  1. सामाजिक वर्ग और वैचारिक द्वंद्व
    ग़ालिब एक कुलीन (Elite) वर्ग से थे जिसकी आर्थिक और सामाजिक नींव हिल चुकी थी।
  • काबा मेरे पीछे है: उस वैभवशाली अतीत का खो जाना जो अब केवल यादों में है।
  • कलीसा मेरे आगे: मजबूरन उस नई सत्ता (ब्रिटिश) और उसकी संस्कृति की ओर देखना, जहाँ भविष्य की संभावनाएँ तो हैं, लेकिन आत्मसम्मान और पहचान का खतरा भी है।
    निष्कर्ष
    ग़ालिब का यह शेर ‘Modernity’s Dilemma’ (आधुनिकता की दुविधा) को दर्शाता है। समाजशास्त्र के अनुसार, कोई भी समाज जब परिवर्तन के दौर से गुजरता है, तो वह इसी तरह “पीछे छूटती विरासत” और “सामने खड़ी अनजानी आधुनिकता” के बीच फंसा होता है। ग़ालिब ने इस शेर के जरिए उस समय के भारतीय मानस की बेचैनी को अमर कर दिया है।

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