लेखक: gautam ramakant

  • ज्ञान: जीवन का एकमात्र अटूट और शाश्वत सिद्धांत

    भूमिका

    परिवर्तन संसार का नियम है। यहाँ आज का सुख कल के दुःख में बदल सकता है और आज का वैभव कल के अभाव में। लेकिन इस अस्थिरता के बीच एक ऐसा ‘अटूट सिद्धांत’ है जो मनुष्य का साथ कभी नहीं छोड़ता—वह है ज्ञान। ज्ञान वह आंतरिक प्रकाश है जो घोर अंधकार में भी मार्ग प्रशस्त करता है।

    श्रीमद्भगवद्गीता

    श्रीकृष्ण ने गीता में ज्ञान की महिमा को सर्वोपरि माना है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ज्ञान के समान पवित्र करने वाला इस संसार में कुछ भी नहीं है:

    न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। (गीता 4.38)

    अर्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निस्संदेह कुछ भी नहीं है।जब मनुष्य के पास सही ज्ञान (विवेक) होता है, तो वह मोह और भ्रम की स्थिति से बाहर निकल आता है। जिस प्रकार अग्नि ईंधन को जलाकर राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि मनुष्य के सभी संशयों और बंधनों को भस्म कर देती है।संतों की वाणी में ज्ञान का महत्त्वभारत की पावन धरती पर अनेक संतों ने अपने अनुभव से ज्ञान की महत्ता को सिद्ध किया है।

    * कबीर दास जी के अनुसार: कबीर कहते हैं कि केवल पढ़ लेने से कोई ज्ञानी नहीं होता, बल्कि प्रेम और सत्य का अनुभव ही वास्तविक ज्ञान है:

    “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।”

    यहाँ कबीर उस ‘अनुभवजन्य ज्ञान’ की बात कर रहे हैं जो मनुष्य को अहंकार से मुक्त करता है।

    * स्वामी विवेकानंद के विचार: स्वामी जी का मानना था कि ज्ञान हमारे भीतर ही विद्यमान है, उसे बस जाग्रत करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा था:

    “शिक्षा और ज्ञान का अर्थ केवल जानकारी जमा करना नहीं है, बल्कि एकाग्रता और चरित्र निर्माण है।ज्ञान: जो संकट में ढाल बनता हैजीवन में जब कठिन समय आता है, तो धन-दौलत साथ छोड़ सकते हैं, लेकिन अर्जित किया गया बोध (Wisdom) हमेशा साथ रहता है।

    अविनाशी पूँजी: जैसा कि नीति शास्त्र में कहा गया है—”विद्या धनं सर्वधन प्रधानम्”।

    यह ऐसा धन है जिसे न कोई चोर चुरा सकता है और न ही राजा छीन सकता है।

    निर्णय लेने की शक्ति: संत तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है—*”बिनु सत्संग विवेक न होई” अर्थात बिना सही ज्ञान और संगति के विवेक पैदा नहीं होता, और विवेक ही हमें सही निर्णय लेने की शक्ति देता है।

    निष्कर्ष

    ज्ञान केवल एक मानसिक व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। यह वह अमूल्य निधि है जो बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक, और इस लोक से परलोक तक मनुष्य का साथ निभाती है। संतों और शास्त्रों का यही मत है कि जो व्यक्ति ज्ञान की खोज में लगा रहता है, वह कभी अकेला या असहाय नहीं होता।

    “ज्ञान बाँटने से बढ़ता है और जीवन में उतारने से वह मोक्ष का द्वार खोलता है ”

  • ईमाँ मुझे रोके है तो, खींचे है मुझे कुफ्र,काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे !!

    मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर उनके सबसे प्रसिद्ध और गहरे शेरों में से एक है। इसमें उन्होंने इंसान के मन के भीतर चलने वाले द्वंद्व (Conflict) को बहुत ही खूबसूरती से बयान किया है।
    यहाँ शेर का आसान अर्थ और उसकी गहराई दी गई है:
    शेर का सरल अर्थ
    “मेरा ईमान (धर्म/आस्था) मुझे गलत रास्ते पर जाने से रोकता है, लेकिन मेरा कुफ्र (बेधर्मी/सांसारिक आकर्षण) मुझे अपनी ओर खींचता है। हालत यह है कि काबा (धर्म का प्रतीक) मेरे पीछे रह गया है और कलीसा (मंदिर या गिरजाघर, जो यहाँ दुनिया के आकर्षण का प्रतीक है) मेरे सामने है।”
    शेर की गहराइयाँ (Analysis)

    • ईमान और कुफ्र की कशमकश: ग़ालिब यहाँ अपनी उस मानसिक स्थिति को दिखा रहे हैं जहाँ एक तरफ नेक रास्ता (धर्म) है और दूसरी तरफ दुनिया की लज़्ज़तें और गुनाह। इंसान अक्सर इन दो ध्रुवों के बीच झूलता रहता है।
    • काबा और कलीसा: * काबा यहाँ उस मंज़िल का प्रतीक है जिसे छोड़कर इंसान आगे बढ़ आया है या जिसे वह भूलता जा रहा है।
    • कलीसा का मतलब वैसे तो गिरजाघर होता है, लेकिन उर्दू शायरी में इसे अक्सर ‘हसीनों के ठिकाने’ या ‘सांसारिक मोह-माया’ के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।
    • बेचैनी का चित्रण: शायर न तो पूरी तरह खुदा का हो पा रहा है और न ही पूरी तरह दुनिया का। वह बीच में खड़ा है—पीछे मुड़कर देखता है तो धर्म याद आता है, सामने देखता है तो दुनिया का आकर्षण उसे अपनी तरफ खींचता है।
      ग़ालिब का अंदाज़
      यह शेर ग़ालिब की उस ‘Human Nature’ को समझने की कला को दिखाता है जिसमें हम जानते हैं कि सही क्या है, लेकिन फिर भी दिल गलत या मुश्किल रास्तों की तरफ खिंचा चला जाता है।

    “ईमाँ मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र,
    काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।”

    मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर केवल एक व्यक्तिगत कशमकश नहीं है, बल्कि इसे एक समाजशास्त्रीय (Sociological) नज़रिए से देखने पर 19वीं सदी के भारतीय समाज के गहरे अंतर्विरोध (Contradictions) नज़र आते हैं।
    ग़ालिब उस दौर में जी रहे थे जब पुरानी मुगलिया तहजीब (Old Order) दम तोड़ रही थी और ब्रिटिश उपनिवेशवाद (New Modernity) अपने पैर पसार रहा था। इस शेर का समाजशास्त्रीय विश्लेषण निम्नलिखित बिंदुओं में किया जा सकता है:

    1. संक्रमणकालीन समाज (Transitional Society)
      ग़ालिब का “काबा” और “कलीसा” के बीच खड़ा होना, असल में उस समय के भारतीय समाज की स्थिति है।
    • काबा (परंपरा): यह पुरानी सामंती व्यवस्था, धार्मिक जड़ों और स्थापित नैतिक मूल्यों का प्रतीक है। समाज का एक हिस्सा इसे छोड़ना नहीं चाहता क्योंकि यही उसकी पहचान है।
    • कलीसा (आधुनिकता/बदलाव): कलीसा (चर्च) यहाँ पश्चिमी शिक्षा, नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और औपनिवेशिक आधुनिकता की ओर इशारा करता है। ग़ालिब के लिए यह केवल ‘ईसाईयत’ नहीं, बल्कि वह ‘नया’ है जो उन्हें अपनी ओर खींच रहा है, भले ही वह अनजाना और डरावना हो।
    1. पहचान का संकट (Identity Crisis)
      समाजशास्त्र में इसे ‘Anomie’ या मूल्यों का बिखराव कह सकते हैं। जब पुराने नियम लागू नहीं हो पाते और नए नियम अभी पूरी तरह समझ नहीं आए होते, तब व्यक्ति और समाज इसी तरह के ‘Liminal Space’ (दो छोरों के बीच की जगह) में होते हैं।
    • ईमान और कुफ्र: यह केवल धार्मिक शब्द नहीं हैं। समाजशास्त्रीय दृष्टि से, ‘ईमान’ वह सामाजिक अनुबंध (Social Contract) है जिसे समाज ने सदियों से माना है, और ‘कुफ्र’ वह विद्रोह है जो यथास्थिति (Status Quo) को चुनौती देता है।
    1. सामाजिक वर्ग और वैचारिक द्वंद्व
      ग़ालिब एक कुलीन (Elite) वर्ग से थे जिसकी आर्थिक और सामाजिक नींव हिल चुकी थी।
    • काबा मेरे पीछे है: उस वैभवशाली अतीत का खो जाना जो अब केवल यादों में है।
    • कलीसा मेरे आगे: मजबूरन उस नई सत्ता (ब्रिटिश) और उसकी संस्कृति की ओर देखना, जहाँ भविष्य की संभावनाएँ तो हैं, लेकिन आत्मसम्मान और पहचान का खतरा भी है।
      निष्कर्ष
      ग़ालिब का यह शेर ‘Modernity’s Dilemma’ (आधुनिकता की दुविधा) को दर्शाता है। समाजशास्त्र के अनुसार, कोई भी समाज जब परिवर्तन के दौर से गुजरता है, तो वह इसी तरह “पीछे छूटती विरासत” और “सामने खड़ी अनजानी आधुनिकता” के बीच फंसा होता है। ग़ालिब ने इस शेर के जरिए उस समय के भारतीय मानस की बेचैनी को अमर कर दिया है।
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